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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
विकारं प्रकृतिं चैव पुरुषं च सनातनम् |  ३५   क
यो यथावद्विजानाति स वितृष्णो विमुच्यते ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति