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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
प्रकृत्या सर्गधर्मिण्या तथा त्रिविधसत्त्वय़ा |  ९   क
विपरीतमतो विद्यात्क्षेत्रज्ञस्य च लक्षणम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति