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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राणस्य चानुदात्तश्च व्याख्याताः पञ्च वंशजाः |  १०   क
देवान्यज्ञमुषश्चान्यान्सृजन्पञ्चदशोत्तरान् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति