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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् |  १२   क
मित्रधर्माणमित्येतान्देवानभ्यसृजत्तपः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति