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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुरप्रवीरं वीरं च सुकेशं च सुवर्चसम् |  १३   क
सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत्तपः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति