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सभा पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे |  ५   क
उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति