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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
समिद्धोऽग्निः शिरस्तस्य वाहू सूर्यनिभौ तथा |  ४   क
त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति