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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
वृहद्रथन्तरं मूर्ध्नो वक्त्राच्च तरसाहरौ |  ७   क
शिवं नाभ्यां वलादिन्द्रं वाय़्वग्नी प्राणतोऽसृजत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति