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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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च्यवन उवाच
अमृतं ह्यक्षय़ं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च |  ३०   क
अमृताय़तनं चैताः सर्वलोकनमस्कृताः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति