आदि पर्व  अध्याय २११

अर्जुन उवाच

दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा |  १८   क
रूपेण चैव सम्पन्ना कमिवैषा न मोहय़ेत् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति