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आदि पर्व
अध्याय २११
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वासुदेव उवाच
प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रिय़ाणां प्रशस्यते |  २२   क
विवाहहेतोः शूराणामिति धर्मविदो विदुः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति