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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
गुरुभिर्निय़मैर्युक्तो भरतो नाम पावकः |  १   क
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रय़च्छति |  १   ख
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति