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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो विभर्ति हुताशनम् |  २०   क
अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति