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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्यच्छति भूतानि येन भूतानि नित्यदा |  २२   क
कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति