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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल |  २५   क
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतय़ेऽग्नय़े ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति