वन पर्व  अध्याय २११

मार्कण्डेय़ उवाच

अग्निं रजस्वला चेत्स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |  २७   क
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या दस्युमतेऽग्नय़े ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति