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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
आर्तो न जुहुय़ादग्निं त्रिरात्रं यस्तु व्राह्मणः |  २९   क
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्यादुत्तराग्नय़े ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति