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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
स दृष्ट्वा विमले व्योम्नि निर्मलं शशलक्षणम् |  २   क
ग्रहनक्षत्रताराभिरनुय़ातममित्रहा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति