वन पर्व  अध्याय २११

मार्कण्डेय़ उवाच

सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |  ३१   क
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नय़े ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति