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आदि पर्व
अध्याय २१२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनञ्जय़ः |  १   क
गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय़ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति