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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा; सानेन वीरेण तथानुवृत्ता |  २३   क
न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा; न जीवशिल्पे न कुले न गोत्रे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति