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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
परदारेषु ये नित्यं चारित्रावृतलोचनाः |  १४   क
यतेन्द्रिय़ाः शीलपरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति