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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
यत्तु सन्तापसंय़ुक्तमप्रीतिकरमात्मनः |  ३०   क
प्रवृत्तं रज इत्येव ततस्तदभिचिन्तय़ेत् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति