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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
असंसर्गो हि भूतेषु संसर्गो वा विनाशिषु |  ४   क
कस्मै क्रिय़ेत कल्पेन निश्चय़ः कोऽत्र तत्त्वतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति