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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
एवं सति कुतः सञ्ज्ञा प्रेत्यभावे पुनर्भवेत् |  ४३   क
प्रतिसंमिश्रिते जीवे गृह्यमाणे च मध्यतः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति