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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
यथा रुरुः शृङ्गमथो पुराणं; हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथावत् |  ४८   क
विहाय़ गच्छत्यनवेक्षमाण; स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति