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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अनुनीय़मानोऽपि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः |  ११   क
नैच्छद्वोढुं हविः सर्वं शरीरं च समत्यजत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति