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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्नष्टे जगद्भीतमथर्वाणमथाश्रितम् |  १७   क
अर्चय़ामासुरेवैनमथर्वाणं सुरर्षय़ः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति