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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् |  २   क
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वय़ेषु द्विजातिषु ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति