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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते |  ४   क
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति