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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ान्तं निय़तं दृष्ट्वा प्रविवेशार्णवं भय़ात् |  ७   क
देवास्तं नाधिगच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति