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आदि पर्व
अध्याय २१३
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वैशम्पाय़न उवाच
गजानां तु प्रभिन्नानां त्रिधा प्रस्रवतां मदम् |  ४७   क
गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति