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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिच्च यक्ष्ये परमप्रतीतः; संय़ुज्य पार्थेन नरर्षभेण |  १७   क
व्रवीहि तत्त्वेन महानुभावः; कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाद्य ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति