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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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भीष्म उवाच
का त्वं केन च कार्येण सम्प्राप्ता चारुहासिनि |  १८   क
कुतश्चागम्यते सुभ्रु गन्तव्यं क्व च ते शुभे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति