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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् |  १३   क
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः |  १३   ख
विभेद राजन्वज्रेण भुवि तन्निपपात ह ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति