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आदि पर्व
अध्याय ८५
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अष्टक उवाच
किं स्वित्कृत्वा लभते तात लोका; न्मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा |  २१   क
तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव; च्छुभाँल्लोकान्येन गच्छेत्क्रमेण ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति