वन पर्व  अध्याय २४४

वैशम्पाय़न उवाच

वीजभूता वय़ं केचिदवशिष्टा महामते |  ७   क
विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात्ते युधिष्ठिर ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति