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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तय़द्भृशम् |  २५   क
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति