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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अमावास्यां सम्प्रवृत्तं मुहूर्तं रौद्रमेव च |  २७   क
देवासुरं च सङ्ग्रामं सोऽपश्यदुदय़े गिरौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति