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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम् |  ३०   क
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति