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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च |  ३१   क
समवाय़ं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रो व्यचिन्तय़त् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति