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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं सञ्चिन्त्य भगवान्व्रह्मलोकं तदा गतः |  ३४   क
गृहीत्वा देवसेनां तामवन्दत्स पितामहम् |  ३४   ख
उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधु शूरं पतिं दिश ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति