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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया |  ३७   क
तत्राभ्यगच्छद्देवेन्द्रो यत्र देवर्षय़ोऽभवन् |  ३७   ख
वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाव्रताः ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति