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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
वध्यमानं वलं दृष्ट्वा वहुशस्तैः पुरन्दरः |  ४   क
स्वसैन्यनाय़कार्थाय़ चिन्तामाप भृशं तदा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति