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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् |  ४०   क
विनिःसृत्याय़यौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत्प्रभुः |  ४०   ख
आगम्याहवनीय़ं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति