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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः |  ४१   क
ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्राय़च्छत दिवौकसाम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति