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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
नैताः शक्या मय़ा द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः |  ४६   क
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात्पश्याम्यभीक्ष्णशः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति