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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः |  ४७   क
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति