वन पर्व  अध्याय २१३

मार्कण्डेय़ उवाच

स शैलं मानसं गत्वा ध्याय़न्नर्थमिमं भृशम् |  ६   क
शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिय़ा तदा ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति