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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभिधावतु मा कश्चित्पुरुषस्त्रातु चैव ह |  ७   क
पतिं च मे प्रदिशतु स्वय़ं वा पतिरस्तु मे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति